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10th science chapter 5 life process

 कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ


(SOME IMPORTANT DEFINITIONS)


1. जैव प्रक्रम (Life Processes)-वे सभी प्रक्रम जो सम्मिलित रूप से अनुरक्षण का कार्य करते हैं, उन्हें जैव प्रक्रा कहते हैं।


2. पोषण (Nutrition)-भोजन के अंतर्ग्रहण करने तथा उसे उपभोग करने की प्रक्रिया पोषण कहलाती है।


3. स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition)-वह पोषण जिसमें जीव पर्यावरण में उपस्थित सरल अकार्बनिय पदाथों से अपना भोजन बनाते हैं, स्वपोषी पोषण कहलाता है।

विज्ञान-X 


4. परपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition)-यह पोषण जिसमें जीव पादप अथवा प्राणी स्रोतों से प्राप्त जैव पदाथों के अंतर्ग्रहण एवं पाचन द्वारा ऊर्जा प्राप्त करते हैं, परपोषी पोषण कहलाता है।

 5. श्वसन (Respiration)-शरीर के बाहर से ऑक्सीजन को ग्रहण करना तथा कोशिकीय आवश्यकता के अनुसारखाद्य स्रोत के विघटन में उसका उपयोग श्वसन कहलाता है।

 6. उत्सर्जन (Excretion)-रासायनिक अभिक्रियाओं में कार्बनिक पदार्थों तथा ऑक्सीजन के उपयोग के बाद अपशिष्ट उपोत्पादों को शरीर से बाहर निकालने का प्रक्रम उत्सर्जन कहलाता है।


7. एंजाइम (Enzymes)-जो जैव उत्प्रेरक, जैव रासायनिक अभिक्रियाओं की दर को बड़ा देते हैं, एंजाइम कहलाते हैं।

 8. प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis)-हरे पौधों द्वारा सूर्य के प्रकाश तथा क्लोरोफिल एवं जल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेटस में अपचयन प्रकाश संश्लेषण कहलाता है।

 9. क्लोरोप्लास्ट (Chloroplasts)-पौधों की पतियों में पाए जाने वाले हरे रंग के वर्णक (लवक) जो प्रकाश संश्लेषण में सहायक होते हैं, क्लोरोप्लास्ट कहलाते हैं।

10. रंध्र (Stomata)-पौधे की पत्तियों पर पाए जाने वाले छोटे-छोटे छिद्र जो पौधों में गैसों का आदान-प्रदान करते हैं, रंध्र कहलाते हैं।

11. मृतोपजीवी (Saprophytes) जो जीव अपना भोजन मृत एवं गले-सड़े कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं. मृतोपजीवी कहलाते हैं।

12. अंतर्ग्रहण (Ingestion) जीवों में भोजन को अन्दर ले जाने का प्रक्रम अंतर्ग्रहण कहलाता है।

13. पाचन (Digestion)-भोजन के अन्तः ग्रहण के बाद उसका सूक्ष्म, सरल एवं घुलनशील अणुओं में परिवर्तित होना पाचन कहलाता है।

14. वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration)-ऑक्सीजन की उपस्थिति में होने वाले श्वसन को वायवीय श्वसन कहते हैं। 

15. अवायवीय श्वसन (Anaerobic Respiration)-ऑक्सीजन को अनुपस्थिति में होने वाले श्वसन को अवायवीय श्वसन कहते हैं।

16. जाइलम (Xylem)-पादपों का ऊतक जो मि‌ट्टी से पानी और खनिजों को पत्तियों तक पहुँचाने का काम करता है, जाइलम ऊतक कहलाता है।

17. फ्लोएम (Phloem)-पादपों का ऊतक जो पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन को पौधों के अन्य भागों तक पहुँचाता है, फ्लोएम ऊतक कहलाता है।

18. धमनियाँ (Arteries) वे रक्त वाहिकाएँ जो हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाती हैं, धमनियाँ कहलाती हैं।

19. शिराएँ (Veins)-वे रक्त वाहिकाएँ जो शरीर के विभिन्न अंगों से विऑक्सीजनयुक्त रक्त को एकत्रित करके हृदय तक पहुँचाती हैं, शिराएँ कहलाती हैं।

20. परासरण नियमन (Osmoregulation)-शरीर में पानी की उचित मात्रा बनाए रखना परासरण नियमन कहलाता है।

21. ग्लाकोलाइसिस (Glycolysis)-कोशिका द्रव्य में होने वाली वह क्रिया जिसमें ग्लूकोज का एक अणु अपघटित होकर पाइरूविक अम्ल बनाता है, ग्लाकोलाइसिस कहलाता है।

22. श्वासोच्छ्‌वास (Breathing)-वह भौतिक प्रक्रिया जिसमें श्वसन गैसों (O₂ तथा CO₂) का शरीर में आदान-प्रदान होता है, श्वासोच्छ्वास कहलाती है।

23. अंतःश्वसन (Inspiration)-वायु मंडलीय वायु (O₂) का फेफड़ों में भरने की क्रिया को अंतः श्वसन कहते हैं।

24. निःश्वसन (Expiration)-फेफड़ों में से CO, अधिपक्य वायु को बाहर निकालना निःश्वसन कहलाता है।

25. वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)-पौधों में से पत्तियों के रंध्रों द्वारा अतिरिक्त पानी का वाष्प के रूप में निकलना वाष्पोत्सर्जन कहलाता है।

26. स्थानांतरण (Translocation)-पौधों में जलीय विलयन के रूप में भोजन का पत्तियों से दूसरे भागों में परिवहन स्थानांतरण कहलाता है।

27. केशिकाएँ (Capillaries)-थे अत्यंत पतली रूधिर वाहिकाएँ जो धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं, केशिकाएँ कहलाती हैं।

28. डायलिसिस (Dialysis)-शरीर में कृत्रिम ढंग से यूरिया आदि अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की पद्धति को डायलिसिस कहते हैं।

29. लसीका (Lymph)-यह पीले रंग का तरल ऊतक है जिसमें श्वेत रुधिर कणिकाएं, ग्लूकोज, खनिज लवण आरि होते हैं।

30. यकृत (Liver)-यह मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है जो पित्तरस खावित करती है।

31. चीर्घरोग (Villi)-क्षुद्रांत्र (Small intestine) के आतरिक अस्तर पर अनेक अंगुली जैसे प्रवर्ध (Projections) हैं जिन्हें दीर्घरोग कहते हैं। ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं।

32. हीमोग्लोबिन (Haemoglobin)-रक्त में विद्यमान लाल रंग की प्रोटीन जो O₂ एवं CO₂ का परिवहन करता है. उसे हीमोग्लोबिन कहते हैं।


33. रक्त (Blood)-यह एक संयोजी ऊतक है जो शरीर में परिवहन का कार्य करता है।


34. हृदय (Heart)-हृदय एक पेशीय अंग है जो शरीर के विभिन्न भागों में रक्त पहुँचाने के लिए पंप की तरह कार्य करता है।


35. रक्त दाब (Blood Pressure)-वह दाब जो रक्त वाहिकाओं की भित्तियों पर लगता है, रक्तदाब 36. वृक्काणु (Nephrons)-वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को वृक्काणु कहते हैं। कहलाता है।


पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न


(TEXTUAL QUESTIONS)


(पेज-90) के प्रश्न


प्रश्न 1. हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने में विसरण क्यों अपर्याप्त है?

उत्तर- मनुष्य जैसे बहुकोशिकीय जीवों की संरचना बड़ी जटिल होती है एवं इनका आकार भी बहुत बड़ा होता है। बहुकोशिकीय जीवों में सभी कोशिकाएँ सीधे ही पर्यावरण के संपर्क में नहीं होती। केवल विसरण द्वारा सभी कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति होने में कई साल लग सकते हैं। इतने समय तक कोशिकाएँ बिना ऑक्सीजन के जीवित नहीं रह सकती। अतः विसरण सभी कोशिकाओं की ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं होता।


प्रश्न 2. कोई वस्तु सजीव है. इसका निर्धारण करने के लिए हम किस मापदंड का उपयोग करेंगे? 

उत्तर- कोई वस्तु जीवित है. इसके निर्धारण के लिए निम्न मापदंडों का उपयोग किया जा सकता है-

(1) शारीरिक गति

(ii) वृद्धि एवं विकास

(iii) श्वसन

(iv) पोषण

(V) उत्सर्जन

(Vi) कोशिकीय संगठन

(Vii) शरीर की मरम्मत

(viii) प्रजनन एवं मृत्यु 

प्रश्न 3. किसी जीव द्वारा किन कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?

उत्तर- (1) श्वसन के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन।

(ii) ऊर्जा प्राप्ति के लिए भोजन (पोषण)

(ii) पौधों को प्रकाश संश्लेषण के लिए CO₂, जल एवं खनिज लवणों को आवश्यकता होती है।

 प्रश्न 4. जीवन के अनुरक्षण के लिए आप किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे?

उत्तर- जीवन के अनुरक्षण के लिए आवश्यक प्रक्रमः

(1) पोषण

(ii) श्वसन

(iii) परिवहन

(iv) उत्सर्जन

 (पेज-96) के प्रश्न

विज्ञान-X 


प्रश्न 1. स्वयंपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण में क्या अंतर है? उत्तर-

स्वयंपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण में निम्नलिखित अंतर हैं-


स्वयंपोषी पोषण

(1) इस पोषण में जीव अकार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन संश्लेषित करते हैं।

(ii) सभी हरे पौधे तथा कुछ जीवाणु इस प्रकार के पोषण के लिए अनुकूलित हैं।

विषमपोषी पोषण

(1) इस पोषण में जीव अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों तथा अन्य जीवों पर निर्भर करता है।

(ii) सभी जंतु, कवक तथा प्रोटोजोआ इस प्रकार के पोषण के लिए अनुकू‌लित हैं।


प्रश्न 2. प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधा कहाँ से प्राप्त करता है?

उत्तर- (1) पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए जल एवं खनिज लवण मृदा (भूमि) से प्राप्त करते हैं।

(ii) प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक CO₂ को पौधे वायुमंडल में से लेते हैं।

प्रश्न 3.  हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका क्या है 

उत्तर- हमारे आमाशय में अम्ल HCI की भूमिका

(1) यह भोजन में विद्यमान सूक्ष्मजीवों को मार देता है।

(ii) यह पेप्सिन एंजाइम की क्रिया के लिए अम्लीय माध्यम प्रदान करता है।

(iii) यह भोजन को नरम कर देता है।

(iv) यह निष्क्रिय एंजाइमों को सक्रिय बनाता है।

(V) यह पाइलोरिक छिद्र के खुलने एवं बंद होने पर नियंत्रण रखता है। 

प्रश्न 4. पाचक एंजाइमों का क्या कार्य है?

उत्तर- हमारे भोजन में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्त्व होते हैं, जैसे-प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा आदि। हमारा शरीर इन पदार्थों को जटिल अवस्था में अवशोषित करके उपयोग में नहीं ला सकता। पाचक एंजाइम इन जटिल पदार्थों को सरल अवयवों में तोड़ देते हैं तथा इन्हें अवशोषण के योग्य बना देते हैं।

उदाहरण


एमिलेज 

(1) स्टार्च     शर्करा

एमिलेज एंजाइम स्टार्च को शर्करा में तोड़ देता है।


(ii) वसा लाइपेज वसीय अम्ल ग्लिसरोल

लाइपेज एंजाइम वसा को वसीय अम्ल एवं ग्लिसरोल में विभाजित कर देता है।

इस प्रकार पाचक एंजाइम भोजन के जटिल अवयवों को सरल अवयवों में विभाजित कर देते हैं। हमारा शरीर इन सरल अवयवों को अवशोषित करके उन्हें उपापचयी क्रियाओं में उपयोग कर लेता है।


प्रश्न 5. पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षुद्रांत्र को कैसे अभिकल्पित किया गया है?


उत्तर- क्षुद्रांत्र की आन्तरिक भित्ति में अंगुली के समान संरचनाएँ पायी जाती हैं। इन संरचनाओं को दीर्घ रोम कहते हैं। ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। दीर्घ रोमों में रूधिर वाहिकाओं की बहुतायत होती है, जो भोजन को अवशोषित करके शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाते हैं।


(पेज-101) के प्रश्न


प्रश्न 1. श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद है?

उत्तर- जलीय जीव जल में घुली हुई ऑक्सीजन का उपयोग श्वसन के लिए करते हैं। जल में घुली हुई ऑक्सीजन को मात्रा बहुत कम होती है। इसलिए जलीय जीवों में श्वसन दर बहुत अधिक होती है।

दूसरी ओर, स्थलीय जीव वायु से सीधा ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। वायु में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसलिए स्थलीय जीव आसानी से पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण कर लेते हैं। इनकी श्वसन दर जलीय जीवों की अपेक्षा कम होती है।

प्रश्न 2. ग्लूकोज़ के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ क्या है?


(HBSE 2018; Pre-board, Jan.-2020)


उत्तर- ग्लूकोज़ के ऑक्सीकरण से ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ निम्नलिखित हैं-


(1) O, को अनुपस्थिति


(यीस्ट में) → एथेनॉल + CO₂ + ऊर्जा (2-कार्बन अणु)


ग्लूकोज़ (6-कार्बन अणु) कोतिर पायरुवेट + ऊर्जा (3 कार्बन अणु)


(ii) O₂ का अभाव → लैक्टिक अम्ल ऊर्जा


(पेशी कोशिका में) (iii), की उपस्थिति (3-कार्बन अणु)


(माइटोकॉन्ड्रिया में)


→ CO₂ + H₂O + ऊर्जा


चित्र-विभिन्न पथों द्वारा ग्लूकोज का विखंडन


पहले कोशिकाद्रव्य में ग्लूकोज का विखंडन पायरुवेट में होता है। इस प्रक्रिया को ग्लूकोलाइसिस कहते हैं तथा यह सभी जीवों में होती है। आगे पायरुवेट का विखंडन निम्न प्रकार से होता है-


(1) O₂ की अनुपस्थिति में पायरुवेट एथेनॉल तथा CO₂ में टूट जाता है तथा कुछ मात्रा में ऊर्जा भी निकलती है।


यह प्रक्रिया यीस्ट में होती है।


(ii) 0, के अभाव में पायरुवेट का विखंडन लैक्टिक अम्ल में होता है तथा कुछ मात्रा में ऊर्जा भी विमुक्त होती है। यह प्रक्रिया हमारी पेशी कोशिका में होती है।


(iii) O₂ की उपस्थिति में पायरुवेट का विखंडन CO₂, जल में होता है तथा अधिक मात्रा में ऊर्जा भी विमुक्त होती है। यह प्रक्रिया माइटोकॉन्ड्रिया में होती है एवं सभी वायवीय जीवों में पायी जाती है।


प्रश्न 3. मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है?

उत्तर- (1) ऑक्सीजन का परिवहन जब हम श्वास अन्दर लेते हैं तो वायु फेफड़ों के अन्दर चली जाती है। फेफड़ों में उपस्थित कृषिकाओं में रक्त वाहिनियाँ होती हैं। फेफड़ों में से ऑक्सीजन रक्त में विसरित हो जाती है तथा हीमोग्लोबिन के साथ मिल जाती है। यह ऑक्सीजन को ऊतकों में ले जाती है। ऊतकों में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण रक्त में से ऑक्सीजन ऊतकों में विसरित हो जाती है। (i) कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन ऊतकों में CO₂ की मात्रा अधिक होने के कारण यह रक्त में मिल जाती है। रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन CO₂ गैस को फेफड़ों में ले जाती है। फेफड़ों से CO₂ श्वासनली में आ जाती है तथा नासाद्वार से बाहर निकल जाती है।


प्रश्न 4. गैसों के विनिमय के लिए मानव फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल को कैसे अभिकल्पित किया है? (HBSE 2018) 

उत्तर- वक्षगुहा (Thoracic Cavity) में प्रवेश करके श्वासनली दो भागों में विभाजित हो जाती है, इन्हें श्वसनों कहते हैं। श्वानी फुफ्फस के अन्दर श्वसनिकाओं में बंटी होती है जिनके अंत में गुब्बारे जैसी संरचनाएँ होती हैं जिनें कृषिकाएँ कहते हैं। कूपिकाओं की भित्ति में रक्त वाहिकाओं का जाल होता है। कूपिकाओं की सतह पर गैसीय विनिमय होता है। यदि कृषिकाओं की सतह को बिछाया जाए तो ये लगभग 80 m² स्थान घेरती हैं। इस प्रकार गैसों के विनिमय के लिए कृषिकाएँ मानव फुफ्फुस में अधिकतम क्षेत्रफल उपलब्ध कराती हैं।

 (पेज-107) के प्रश्न


प्रश्न 1. मानव में वहन तंत्र के घटक कौन से हैं? इन घटकों के क्या कार्य हैं? 

उत्तर- मानव में वहन तंत्र के मुख्य घटकः


(1) हृदय


ii   रक्त वाहिकाएँ


(iii)  रक्त


(iv)  लसिका

विज्ञान-X


(1) हृदय के कार्य- हृदय शरीर के भागों से विऑक्सीजनित रक्त प्राप्त करता है तथा इसे फेफड़ों में पहुंचाता है।

फेफड़ों में रक्त ऑक्सीजनयुक्त हो जाता है। हृदय फेफड़ों से ऑक्सीजनयुक्त रक्त को प्राप्त करता है। तथा

पूरे शरीर में इसे पंप कर देता है। वहन तंत्र के घटकों के कार्य-

(ii) रक्त के कार्य- रक्त ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पाचित भोजन, हामौन तथा मूरिया जैसे नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करता है। यह शरीर की बीमारियों से भी रक्षा करता है तथा शरीर के ताप को बनाए रखता है।


(iii) रूधिर वाहिकाओं के कार्य-रूधिर वाहिकाएँ (धर्मनियाँ, शिराएँ एवं कंशिकाएँ) रक्त को हदय से शरीर के भागों में पहुँचाने का कार्य करती हैं तथा शरीर के भागों से वापस हृदय में पहुँचाती हैं।


(iv) लसिका के कार्य-यह रक्त के बाद दूसरा तरल संयोजी ऊतक है जो अंतर कोशिकीय स्थानों में भरा होता है तथा अनेक प्रकार के संक्रमण से शरीर को बचाता है।


प्रश्न 2. स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को अलग करना क्यों आवश्यक है? 

उत्तर- स्तनधारी तथा पक्षियों का अपना ताप स्थिर रखने के लिए बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है।

ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। इसलिए स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रूधिर को अलग करना आवश्यक है ताकि इनके शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन प्राप्त हो सके।


प्रश्न 3. उच्च संगठित पादप में वहन तंत्र के घटक क्या हैं? 

उत्तर- उच्च संगठित पादपों में जाइलम तथा फ्लोएम वहन तंत्र के घटक हैं। जाइलम ऊतक पाद‌पों में जल एवं खनिज लवणों का परिवहन करता है तथा फ्लोएम भोजन को शरीर के भागों में पहुँचाने का कार्य करता है।

जाइलम के घटक-वाहिकाएँ, वाहिनिकाएँ, जाइलम पेरेन्काइमा, जाइलम फाइबर आदि। फ्लोएम के घटक-चालनी नलिकाएँ, साथी कोशिकाएँ,

फ्लोएम पेरेन्काइमा, फ्लोएम फाइबर आदि।


प्रश्न 4. पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है?

 उत्तर- पादपों में जल और खनिज लवण का वहन जाइलम ऊतक द्वारा होता है। पौधों की जड़ों में मूलरोम होते हैं। ये मूलरोम प्रत्यक्ष रूप से मृदा में उपस्थित जल के संपर्क में होते हैं। जल एवं घुले हुए लवण परासरण द्वारा मृदा से मूलरोम में प्रवेश करते हैं। जड़ में उपस्थित जाइलम ऊतक की वाहिकाएँ एवं तने की वाहिकाएँ परस्पर जुड़ी होती हैं। तने की वाहिकाएँ विभाजित होकर पत्तियों में प्रवेश करती हैं। इस प्रकार जल एवं खनिज लवण जड़ से तना तथा तने से पत्तियों में पहुँच जाते हैं। पत्तियों में उपस्थित रंध्रों से वाष्पोत्सर्जन के कारण लगातार जल एवं उसमें घुले लवणों का स्थानांतरण पौधे के सभी भागों में हो जाता है।

प्रश्न 5. पादप में भोजन का स्थानांतरण कैसे होता है। 


उत्तर- पादपों में भोजन का निर्माण मुख्यतः पत्तियों में होता है। भोजन का परिवहन फ्लोएम ऊतक द्वारा होता है। ऊर्जा का उपयोग रूप में ATP का उपयोग करके पत्तियों द्वारा बनाए भोजन (जैसे सुक्रोज) को फ्लोएम की चालनी नलिकाओं में स्थानांतरित किया जाता है। पत्तियों को कोशिकाओं में से जल चालनी नलिकाओं में प्रवेश कर जाता है। जिसके कारण फ्लोएम की चालनी नलिकाओं में परासरण दाथ बढ़ जाता है। उच्च दाब के कारण फ्लोएम ऊतक पौधे के उन सभी भागों में भोजन का स्थानांतरण कर देता है जहाँ कम दाब होता है। इस प्रकार पौधे में आवश्यकतानुसार भोजन का स्थानांतरण होता रहता है।

(पेज-109) के प्रश्न


प्रश्न 1. वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।

 उत्तर- वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई को वृक्काणु कहते हैं।


(1) वृक्काणु की संरचना-प्रत्येक वृक्काणु में एक कप की आकृति की संरचना होती है, जिसे बोमन संपुट कहते हैं। इसमें केशिकाओं का एक जाल-सा होता है जिसे वृक्क केशिकागुच्छ कहते हैं। बोमन संपुट से एक कुंडलित धमनी नलिका निकलती है। यह नलिका फिर 'U' आकार की संरचना बनाती है जिसे हैनले का लूप कहते हैं। यह फिर एक और कुंडलित नलिका बनाती है जो संग्राहक वाहिनी में जाकर मिलती है।

(ii) वृक्काणु की कार्यविधि- वृक्कक धमनी रक्त को बोमन संपुट के केशिकागुच्छ में लेकर जाती है। केशिकागुच्छ में रक्त को छाना जाता है जिसके कारण यूरिया तथा यूरिक अम्ल जैसे अपशिष्ट पदार्थ रक्त में से छनकर अलग हो जाते हैं। इसमें कुछ उपयोगी पदार्थ जैसे-ग्लूकोज, अमीनो अम्ल तथा कुछ लवण भी छनकर यूरिया के साथ मिल जाते हैं। जब निस्यंद (Filtrate) कुडलित नलिका तथा हेनले के लूप में से गुजरता है तो इसमें से उपयोगी पदार्थों का अवशोषण हो जाता है तथा अपशिष्ट पदार्थ मूत्र के रूप में संग्राहक वाहिनी में चले जाते हैं तथा फिर मूत्राशय में एकत्रित हो जाते हैं।


प्रश्न 2. उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं? (HBSE 2017)

 उत्तर- पादपों में CO₂, ऑक्सीजन, जलवाष्प, लैटक्स, रेजिन आदि उत्सर्जी उत्पाद होते हैं। इन पदार्थों से छुटकारा परं के लिए पादप विभिन्न युक्तियों का उपयोग करते हैं।


(1) प्रकाश संश्लेषण से उत्पन्न O, गैस को पादप रंध्रों द्वारा बाहर निकालते हैं।

(ii) पादप श्वसन द्वारा उत्पन्न CO₂ गैस को भी रंध्रों द्वारा बाहर निकालते हैं।

(iii) कुछ पौधे अपनी पत्तियों को गिरा देते है तथा उनमें संचित अपशिष्ट पदार्थों से छुटकारा पाते हैं।

(i v) पादप अपने अपशिष्टों को रिक्तिका में भी संचित रखते हैं।

(V) कुछ अपशिष्ट उत्पाद रेजिन तथा गोंद के रूप में पुराने जाइलम में संचित रहते हैं।

(Vi) कुछ अपशिष्ट पदार्थों को पादप अपने आसपास की मृदा में उत्सर्जित करते हैं।

(Vii) अधिक जल को वाष्पोत्सर्जन द्वारा उत्सर्जित कर देते हैं।


प्रश्न 3. मूत्र बनने की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है?


उत्तर- मूत्र बनने की मात्रा का नियमन वृक्क द्वारा होता है। यह जल एवं उसमें घुले अपशिष्टों की मात्रा पर निर्भर करता है। (1) जल की मात्रा जब ऊतकों में जल की अधिकता होती है तो तनु (पतला) मूत्र अधिक मात्रा में उत्पति होता है। जब ऊतकों में जल की मात्रा कम होती है तो कम मात्रा में सांद्रित (गाढ़ा) मूत्र उत्सर्जित होता है। (ii) घुले हुए अपशिष्टों की मात्रा घुले हुए अपशिष्टों जैसे यूरिया, यूरिक अम्ल तथा लवणों को शरीर में उत्सर्जित किया जाता है। जब शरीर में अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है तो उन्हें उत्सर्जित करने के लिए अधिक जल की आवश्यकता होती है। इसलिए, मूत्र की मात्रा बढ़ती है।

(ii) हार्मोन-मूत्र बनने की मात्रा का नियमन कुछ हामर्मोन द्वारा भी होता है। ये हामोंन जल एवं Na' आयनों के वृक्काणु में अन्दर जाने तथा बाहर निकलने के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।


विज्ञान-X 


पाठ्यपुस्तक के अभ्यास के प्रश्न (TEXTUAL EXERCISES)


प्रश्न 1. मनुष्य में वृक्क एक तंत्र का भाग है जो संबंधित है-


(a) पोषण

(b) श्वसन

(c) उत्सर्जन

(d) परिवहन


(b) भोजन का वहन


उत्तर-

(b) भोजन का वहन

प्रश्न 2. पादप में जाइलम उत्तरवायी है-


(a) जल का वहन

(b) भोजन का वहन

(C) ऑक्सीजन का वहन

(d) अमीनो अम्ल का वहन


उत्तर- (a) जल का वहन


प्रश्न 3. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक है

(a) कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल

(b) क्लोरोफिल

(c) सूर्य का प्रकाश

(d) उपरोक्त सभी

उत्तर

(d) उपरोक्त सभी


प्रश्न 4. पायरुवेट के विखंडन से यह कार्बन डाइऑक्साइड जल तथा ऊर्जा देता है और यह क्रिया होती है-


(a) कोशिकाद्रव्य

(b) माइट्रोकॉन्ड्रिया

(c) हरित लवक

(d) केन्द्रक

उत्तर-

(b) माइट्रोकॉन्ड्रिया

(HBSE 2018)


वसा का पाचन-यकृत द्वारा स्रावित पित्त रस तथा अग्न्याशय रस दोनों क्षुद्रांत्र में पहुँच जाते हैं। पितरस में उपस्थित


लवण वसा को छोटी-छोटी गोलियों में तोड़ देते हैं; इस क्रिया को इमल्सीकरण कहते हैं। इस प्रक्रम के कारण


प्रश्न 5. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है? उत्तर- हमारे शरीर में वसा का पाचन क्षुद्रांत्र में होता है।


एंजाइमों को क्रिया करने के लिए बड़ा सतही क्षेत्रफल उपलब्ध हो जाता है। अग्न्याशय रस में उपस्थित लाइपेज एंजाइम इमल्सीकृत वसा को तोड़ देता है। क्षुद्रांत्र की भित्ति में उपस्थित ग्रथिर्या आंत्र रस स्वावित करती हैं जिसमें उपस्थित लाइपेज एंजाइम वसा को वसीय अम्ल एवं ग्लिसरॉल में बदल देते हैं।


पित्तरस वसा इमल्सीकृत वसा अग्न्याशय रस वसा का टूटना आज उस वसीय अम्ल ग्लिसरॉल


प्रश्न 6. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है? भोजन के पाचन में लार की भूमिकाः


उत्तर-


(1) लार में विद्यमान टायलिन नामक एंजाइम स्टार्च का पाचन करके उसे माल्टोज में बदल देता है। स्टार्च


(जटिल अणु)


याइलिन माल्टोज (शर्करा)


(सरल अणु)


(i) लार मुख के खोल (mouth cavity) को साफ रखती है तथा भोजन को चिकना (moisten) एवं मुलायम (soften) बनाती है जिसमें भोजन को आसानी से चबाने तथा बड़े टुकड़ों को छोटे टुकड़ों में तोड़ने में सहायता


मिलती है।


प्रश्न 7. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियों कौन-सी हैं और उसके उतोत्पाद क्या है?


उत्तर- स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँः (1) कोशिकाओं में क्लोरोफिल की उपस्थिति।


(ii) हरे पौधों अथवा पादप कोशिकाओं में जल की आपूर्ति होना।


(ii) सूर्य का प्रकाश


(iv) कार्बन डाई ऑक्साइड की आपूर्ति होना।


स्वपोषी पोषण के उपोत्पाद (By-Products): ऑक्सीजन

प्रश्न 8. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में अंतर कीजिए। कुछ जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।


उत्तर- वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में निम्नलिखित अंतर हैं-


वायवीय श्वसन


अवायवीय श्वसन


1. यह प्रक्रम अऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है।


2. इस क्रिया में भोजन का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है।


1. 2. यह प्रक्रम ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। इस क्रिया में भोजन का अपूर्ण ऑक्रीकरण हंसता है।


3. वायवीय श्वसन के अन्तिम उत्पाद CO, तथा जल


3. अवायवीय श्वसन के अंतिम उत्पाद एथेनॉल एवं CO₂ अथवा लैक्टिक अम्ल है।


4. इस क्रिया में अधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है।


4. इस क्रिया में कम मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है।


5. वायवीय श्वसन कोशिका द्रव्य तथा माइटोकॉन्ड्रिया दोनों में पूर्ण होता है।


5. अवायवीय श्वसन कंवल कोशिकाद्रव्य में ही पूर्ण होता है।


यीस्ट तथा कुछ जीवाणुओं में अवायवीय श्वसन होता है। प्रश्न 9. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं?


उत्तर- (1) कूपिकाएँ पतली भित्ति की संरचनाएँ होती हैं तथा इनमें रूधिर वाहिकाओं का जाल बिछा होता है। इसके कारण कृपिकाओं में भरी वायु तथा रक्त के बीच गैसों का विनिमय आसानी से हो जाता है। (a) कूपिकाओं की संरचना गुब्बारे की तरह होती है। इसलिए ये गैसों के विनिमय के लिए अधिकतम सतही


क्षेत्रफल उपलब्ध कराती है।


प्रश्न 10. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं?


उत्तर- हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी से अरक्तता (Anaemia) हो जाता है। इसके कारण रक्त द्वारा ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता घट जाती है जिसके फलस्वरूप भोजन के ऑक्सीकरण से उत्पन्न ऊर्जा में कमी आएगी। इसलिए हम बीमार पड़ जाएंगें तथा शीघ्र थक जाएंगे। हमारा भार कम हो जाएगा। हमारा रंग फीका पड़ जाएगा तथा हम कमजोरी महसूस करेंगे।


प्रश्न 11. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की व्याख्या कीजिए। यह क्यों आवश्यक है? उत्तर- (Pre-board, Jan.-2020) दोहरा परिसंचरण-मनुष्य के हृदय में रक्त दो बार प्रवेश करता है तथा दो बार ही हृदय से बाहर निकलता है।


विऑक्सीजनित रक्त शरीर के विभिन्न भागों से महाशिराओं द्वारा दाएँ आलिंद में इक‌ट्ठा किया जाता है। जब दायाँ आलिंद सिकुड़ता है तो रक्त दाएँ निलय में चला जाता है। दाएँ निलय से विऑक्सीजनित रक्त फुफ्फुस धमनियों (Pulmonary arteries) द्वारा फेफड़ों में पहुंचा दिया जाता है। जहाँ पर रक्त ऑक्सीजनित हो जाता है। यह रक्त ऑक्सीजनित होकर फुफ्फस शिराओं (Pulmonary Veins) के द्वारा वापिस हृदय में प्रवेश करता है एवं बाएँ आलिंद में आ जाता है तथा फिर बाएँ निलय में चला जाता है। यहाँ से ऑक्सीजनित रक्त को महाधमनी के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों में वितरित किया जाता है। इस प्रकार रक्त दो बार हृदय में से गुजरता है। यही कारण है कि इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं।


दोहरे परिसंचरण की आवश्यकता हृदय का दायाँ तथा बायाँ भाग क्रमशः विऑक्सीजनित तथा ऑक्सीजनित रक्त को अलग-अलग रखने में सहायक होते हैं। दोहरे परिसंचरण के कारण शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन प्राप्त हो जाती है। मनुष्य में यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि शरीर का स्थिर ताप बनाए रखने के लिए ऊर्जा की लगातार आपूर्ति आवश्यक है।


प्रश्न 12. जाइलम व फ्लोएम में पदार्थों के वहन में क्या अंतर है?


उत्तर-


जाइलम व फ्लोएम में पदार्थों के वहन में निम्नलिखित अन्तर हैं:-


जाइलम (1) जाइलम जड़ों से पत्तियों तथा पादप के विभिन्न भागों में जल एवं खनिज लवण पहुँचाने का कार्य करता है।


फ्लोएम


(1) फ्लोएम पत्तियों से भोजन को घुलित अवस्था में पादप के दूसरे भागों में पहुँचाने का कार्य करता है।

विज्ञान-X | 131


(ii) जाइलम में वाहिकाओं तथा वाहिनिकाओं द्वारा पदार्थों का परिवहन होता है।


(ii) फ्लोएम में चालनी नलिकाओं द्वारा पदार्थों का परिवहन होता है।


(iii) जाइलम द्वारा जल एवं लवण ऊपर की ओर पहुँचाए जाते हैं।


(iii) फ्लोएम द्वारा भोजन का स्थानांतरण ऊपर एवं नीचे की ओर होता है। इसमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है।


प्रश्न 13. फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा कार्यविधि की तुलना कीजिए।


उत्तर-


फुफ्फुस में कूपिकाएँ


1. कूपिकाएँ फुफ्फस की क्रियात्मक इकाई होती हैं।


2 कूपिकाएँ CO₂ तथा O, गैसों के विनिमय के लिए उपयुक्त हैं।


3. ये गैसों के विनिमय के लिए अधिकतम सतही क्षेत्रफल उपलब्ध कराती हैं।


4. एक फुफ्फस में लगभग 30 करोड़ कूपिकाएँ होती


A. बहुविकल्पीय प्रश्न (MULTIPLE CHOICE QUESTIONS)


1. वृक्काणु वृक्क की क्रियात्मक इकाई है।


2 वृक्काणु रक्त को छानने तथा परासरण नियमन के लिए उपयुक्त है।


3. नेफ्रॉन का सतही क्षेत्रफल इतना अधिक नहीं होता।


वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन)


4. एक वृक्क में लगभग 10 लाख नेफ्रॉन (वृक्काणु) होते है।


प्रश्न


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