10th chapter 7
कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाएँ (SOME IMPORTANT DEFINITIONS)
1. जनन (Reproduction)-वह प्रक्रिया जिसमें एक जीव अपने जैसे जीव को उत्पन्न करता है, जनन कहलाता है।
2. लैंगिक जनन (Sexual Reproduction)-जनन की वह विधि जिसमें नर और मादा युग्मकों के संयोजन से नया जीव उत्पन्न होता है, लैंगिक जनन कहलाता है।
3. अलैगिंक जनन (Asexual Reproduction)-जनन की वह विधि जिसमें नर और मादा युग्मकों के संयोजन के बिना नया जीव उत्पन्न होता है अर्थात् एक ही जीव से नए जीवों की उत्पत्ति होती है, उसे अलैंगिक जनन कहते हैं।
4. विखंडन (Fission)-अलैंगिक जनन की वह विधि जिसमें एक सूक्ष्मजीव जीव दो अथवा दो से अधिक भागों में विभाजित हो जाता है तथा प्रत्येक भाग से नए जीव की उत्पत्ति होती है, उसे विखंडन कहते हैं।
5. द्विखंडन (Binary Fission)-अलैगिक जनन की वह विधि जिसमें अमीबा जैसा एक कोशिकीय जीव दो भागों में विभक्त हो जाता है तथा प्रत्येक भाग से एक नए जीव की उत्पत्ति होती है, उसे द्विखंडन कहते हैं।
6. बहुखंडन (Multiple Fission)-अलैंगिक जनन की वह विधि जिसमें एक कोशिकीय जीव जैसे प्लैन्मोडियम कई भागों में विभक्त हो जाता है तथा प्रत्येक भाग से एक नए जीव की उत्पत्ति होती है; उसे बहुखंडन कहते हैं।
7. खंडन (Fragmentation)-अलैंगिक जनन की वह विधि जिसमें एक तंतुनुमा बहुकोशिकीय जीव जैसे स्पाइरोगाइरा दो अथवा दो से अधिक टुकड़ों में टूट जाता है तथा प्रत्येक भाग कोशिका विभाजन द्वारा पूर्ण जीव में विकसित हो जाता है. उसे खंडन कहते हैं।
8. पुनरूद्भवन/पुनर्जनन (Regeneration)-कुछ जीवों में अपने शरीर के किसी भी कायिक भाग द्वारा खोये हुए अंगों को विकसित करने की क्षमता होती है, जिसे पुनरूद्भवन कहते हैं। प्लेनेरिया जैसे जीवों में इस विधि द्वारा नए जीव उत्पन्न करने की क्षमता होती है।
9. बीजाणु का बनना (Spore Formation)-यह कुछ जीवों जैसे-कवक, जीवाणु आदि में अलैंगिक जनन की वह विधि है जिसमें बीजाणु (एककोशिकीय संरचना) द्वारा नये जीव की उत्पत्ति होती है।
10. कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation)-अलैंगिक जनन की वह विधि जिसमें पादप के कायिक भागों जैसे-जड़, तना, पत्ती आदि से नए पौधे उगाए जाते हैं, उसे कायिक प्रवर्धन कहते हैं।
11. मुकुलन (Budding)-कुछ जीवों जैसे हाइड्रा, यीस्ट आदि में शरीर से कुछ उभार-सा निकलता है जिसे मुकुल कहते हैं। इस मुकुल से नए जीव की उत्पत्ति होती है जिसे मुकुलन कहते हैं।
12. नर युग्मक (Male Gamete)-नर में एककोशिकीय लैगिक कोशिका जिसे शुक्राणु कहते हैं, नर युग्मक कहलाता है।
13. मादा युग्मक (Female Gamete)-मादा में एक कोशिकीय लैंगिक कोशिका जिसे अंडाणु कहते हैं, मादा युग्मक कहलाता है।
14. निषेचन (Fertilisation)-नर तथा मादा युग्मक के संयोग करने की क्रिया निषेचन कहलाती है।
15. बाहा निषेचन (External Fertilisation)-जब नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा शरीर से बाहर होता है तो उसे बाह्य निषेचन कहते हैं।
16. आन्तरिक निषेचन (Internal Fertilisation)-जय नर और मादा युग्मकों का संलयन मादा शरीर में होता है ती उसे आतरिक निषेचन कहते हैं।
17. युग्मनज (Zygote)-निषेचन के पश्चात जो द्विगुणित कोशिका बनती है, उसे युग्मनज कहते हैं।
18. परागण (Pollination)-परागकोश से परागकणों का पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागकण कहलाता है।
19. स्वपरागण (Self-pollination)-किसी फूल के परागकोशों से परागकणों का उसी फूल या उसी पौधे पर अन्य फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचना, स्वपरागण कहलाता है।
20. परपरागण (Cross-pollination)-किसी फूल के परागकोशों से परागकणों का उसी स्पीशीज के दूसरे पौधे फूल के वर्तिकाग्र तक पहुंचाना पर-परागण कहलाता है।
21. एकलिंगी पुष्य (Unisexual Flowers)-वे पुष्प जिनमें पुंकेसर और स्त्रीकेसर अलग-अलग पुष्पों में होते हैं, एकलिंगी पुष्प कहलाते हैं।
22. द्विलिंगी पुष्प (Bisexual Flowers)-वे पुष्प जिनमें पुंकेसर और स्त्रीकेसर दोनों एक ही पुष्प में होते हैं. द्विलिंगी पुष्प कहलाते हैं।
23. भ्रूण (Embryo)-बहुकोशिकीय संरचना जो युग्मनज से विकसित होती है. भ्रूण कहलाता है।
24. बीज (Seed)-परिपक्व बीजांड (ovule) जिसमें भ्रूण होता है।
25. बीजपत्र (Cotyledons)-छोटे पते की तरह की संरचनाएँ जो बीजांड के परिपक्व होते समय बीज में विकसित होती है तथा जिसमें सामान्यतः भोजन संचित होता है, बीजपत्र कहलाते हैं।
26. यौवनारंभ (Puberty)-जब नर एवं मादा में युग्मक बनने प्रारंभ हो जाते है तथा उनका लैंगिक जीवन प्रारंभ हो जाता है, उसे यौवनारंभ कहते हैं।
27. अंडोत्सर्जन (Ovulation) अंडाशय से अंडा छोड़ने की प्रक्रिया को अंडोत्सर्जन कहते हैं।
28. प्लैग्रेटा (Placenta)-एक तश्तरीनुमा संरचना जो गर्भाशय की भित्ति में धंसी होती है, जिसके माध्यम से धूण पोषण ग्रहण करता है तथा व्यर्थ पदार्थ उत्सर्जित करता है, प्लेसेंटा कहलाता है।
29. आरोपण (Implantation)-भ्रूण का गर्भाशय से जुड़ने की प्रक्रिया को आरोपण कहते हैं। 30. प्रसव (Parturition)-भ्रूण के पूर्ण विकसित होने पर जन्म लेने की प्रक्रिया को प्रसव कहते हैं।
31. रजोधर्म (Menstruation)-मानव मादा में रक्त स्राव जो गर्भाशय की भित्ति फटने के कारण होता है, रजोधर्म कहलाता है।
32. यौन संचरित रोग (Sexually Transmitted Diseases)-मनुष्य में जो रोग यौन क्रिया के कारण फैलते हैं. पोर संचारित रोग कहलाते हैं।
33. गर्भनिरोधक (Contraceptives)-वे उपाय जो गर्भधारण को रोकने के लिए प्रयुक्त होते हैं, गर्भनिरोधक कहलाते हैं।
पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न
(TEXTUAL QUESTIONS)
प्रश्न 1. डी.एन.ए., प्रतिकृति का जनन में क्या महत्त्व है?
उत्तर : डी.एन.ए. प्रतिकृति का जनन में निम्नलिखित महत्त्व है-
() यह स्पीशीज के गुणों को बनाए रखती है।
() इसके कारण जीवन की निरंतरता बनी रहती है।
() इसके कारण पैतृक गुण संतान में स्थानांतरित होते हैं।
() इससे जीषों में विभिन्नताएँ आती है।
प्रश्न 2. जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए तो लाभदायक है परंतु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है क्यों?
उत्तर- व्यष्टि में उत्पन्न विभिन्नताएँ अगली पीढ़ी में स्थानांतरित हो भी सकती है और नहीं भी। यदि जीव की मृत्यु नहीं होती तो उस जीव में उत्पन्न विभिन्नताएँ अगली पीढ़ी में जनन प्रक्रम द्वारा स्थानांतरित हो जाती हैं, परन्तु यदि जीव को मृत्यु हो जाती है तो विभिन्नताएँ जीव की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती हैं तथा अगली पीढ़ी में स्थानांतरित नहीं हो पाती।
परन्तु यदि विभिन्नताएँ स्पीशीज में होती हैं तो अगली पीढ़ी में ये जनन के द्वारा स्थानांतरित हो जाती हैं। धीरे-धीरे बहुत लंबे समय में ये विभिन्नताएँ नई जाति के उद्भव में सहायक रहती हैं। इसलिए विभिन्नताएँ किसी जाति के जीवित रहने में लंबे समय तक उपयोग में रहती हैं।
पाठ्यपस्तक के प्रश्न
प्रश्न 1. द्विखंडन बहुखंडन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर- द्विखंडन तथा बहुखंडन में निम्नलिखित अन्तर है-
द्विखंडन। बहुखंडन।
1. इस प्रक्रम में एक जीव दो समान जीवों में विभक्त 1. हो जाता है।
1 इस प्रक्रम में एक जीव अनेक जीव उत्पन्न करता है।
2. इसमें जीव सिस्ट नहीं बनाता।
2. इसमें जीव सिस्ट बनाता है।
3. यह सामान्यतः अनुकूल परिस्थितियों में होता है। 3. उदाहरण- अमीबा, लेस्मानिया।
3 यह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हो सकता है। उदाहरण-प्लेज्मोडियम।
प्रश्न 2. बीजाणु द्वारा जनन से जीव किस प्रकार लाभान्वित होता है?
उत्तर- बीजाणु द्वारा जनन से जीव निम्नलिखित प्रकार से लाभान्वित होता है-
(1) बीजाणु मोटो भित्ति से ढके होते हैं। यह भित्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में भी इनकी रक्षा करती है।
(ii) बीजाणु बहुत अधिक संख्या में उत्पन्न होते हैं, इसलिए उनके जीवित रहने की संभावना बहुत अधिक होती है।
(iii) बीजाणु हल्के होने के कारण वायु द्वारा सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाते हैं तथा अनुकूल परिस्थितियों में वे अंकुरित हो जाते हैं।
प्रश्न 3. क्या आप कुछ कारण सोच सकते हैं जिससे पता चलता हो कि जटिल संरचना वाले जीव पुनरुद्भवन द्वारा नयी संतति उत्पन्न नहीं कर सकते ?
उत्तर- जटिल संरचना वाले बहुकोशिकीय जीवों में कुछ विशिष्ट कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती है, ऊतकों से अंग बनते हैं, अंगों से अंग तंत्र बनते हैं तथा अंत में अंगतंत्र मिलकर जीव बनाते हैं। इस प्रकार जटिल संरचना वाले बहुकोशिकीय जीवों के शरीर में उच्च स्तर का संगठन होता है तथा इन्हें शरीर के किसी भी कटे हुए भाग से पुनरुद्भवन द्वारा उत्पन्न नहीं किया जा सकता। उदाहरण-मनुष्य एक बहुकोशिकीय जीव है जिसकी शारीरिक संरचना बहुत जटिल है। इसका प्रत्येक अंग विशिष्ट कोशिकाओं से बना होता है। इसलिए इसको शरीर के किसी एक भाग जैसे अंगुली से उत्पन्न नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंगुली की कोशिकाएँ मनुष्य के अन्य अंगों जैसे हृदय, फेफड़े, आमाशय आदि बनाने में सक्षम नहीं होती।
प्रश्न 4. कुछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर- कुछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग किया जाता है। इसके निम्नलिखित कारण है-
(1) कुछ पौधे बीज उत्पन्न नहीं करते, इसलिए ऐसे पौधों को केवल कायिक प्रवर्धन द्वारा ही उगाया जा सकता है, जैसे-केला।
(ii) कुछ पौधे इस प्रकार के बीज उत्पन्न करते हैं जिनका अंकुरण ही नहीं हो सकता। ऐसे पौधों को केवल कायिक प्रवर्धन के द्वारा ही उगाया जाता है; जैसे अंगूर।
(ii) पौधों में पैतृक गुणों को संरक्षित करने के लिए भी इस विधि को अपनाया जाता है।
(iv) कम समय में अधिक संख्या में पौधों को उगाने के लिए भी इस विधि का उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 5. डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक क्यों है?
उत्तर- डीएनए को प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक है ताकि पैतृक गुणों को संतान के अन्दर स्थानांतरित किया डी. पना की प्रतिकृति बनाना अनवभिन्नताएँ भी उत्पन्न होती हैं। ये विभिन्नताएँ जीव को विभिन्न परिस्थितियां व जीवित रहने के योग्य बनाती है। यह जीवन की निरंतरता बनाए रखता है।
* अनुभाग 7.3 (पेज-139) के प्रश्न
प्रश्न 1. परागण क्रिया निषेचन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर- परागण तथा निषेचन में निम्नलिखित अन्तर हैं-
परागण
(i) इस प्रक्रम में परागण स्त्रीकेसर के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं।
(ii) यह पुष्पी पादपों में जनन क्रिया का प्रथम चरण है।
(iii) परागण क्रिया दो प्रकार की होती है- स्व-परागण और पर-परागण।
(iv) परागकणों के स्थानांतरण के लिए वाहकों की आवश्यकता होती है।
(v) इस प्रक्रम में अनेक परागकण नष्ट हो जाते हैं।
निषेचन
(1) इस प्रक्रम में नर एवं मादा युग्मकों का संलयन होता है।
(ii) यह पुष्पी पादपों में जनन क्रिया का दूसरा चरण है।
(iii) निषेचन क्रिया दो प्रकार की होती है-आन्तरिक निषेचन तथा बाह्य निषेचन।
(iv) निषेचन में वाहकों की आवश्यकता नहीं होती।
(v) इस प्रक्रम में परागकण नष्ट नहीं होते।
(०) इस प्रक्रम में परागकण नष्ट नहीं होते।
प्रश्न 2. शुक्राशय एवं प्रोस्टेट ग्रंथि की क्या भूमिका है?
उत्तर- शुक्राशय तथा प्रोस्टेट ग्रंथि के कार्य-
(1) दोनों शुक्राशय तथा प्रोस्टेट ग्रंथि तरल का स्रावण करती हैं जो वीर्य का भाग बनते हैं।
(i) इनके द्वारा सावित तरल शुक्राणुओं के गति करने वाले पथ को चिकना बनाता है।
(iii) इनका स्रावण मूत्रमार्ग की अम्लीयता से शुक्राणुओं की रक्षा करता है।
(iV) इनके द्वारा स्स्रावित तरल पदार्थ शुक्राणुओं को पोषण प्रदान करता है।
प्रश्न 3. यौवनारंभ के समय लड़कियों में कौन-से परिवर्तन दिखाई देते हैं? (HBSE 2023)
उत्तर- यौवनारंभ के समय लड़कियों में निम्नलिखित परिवर्तन दिखाई देते हैं-
(1) काँख तथा जांघों के मध्य जनन अंगों के आसपास बाल उग जाते हैं।
(ii) स्तन विकसित हो जाते हैं तथा उनका आकार बढ़ जाता है।
(iii) कूल्हे चौड़े हो जाते हैं।
(iv) शरीर के विभिन्न अंगों जैसे कूल्हों आदि में अधिक वसा जमा हो जाती है।
(V) डिंबवाहिनी, गर्भाशय और योनि का आकार बढ़ जाता है।
(Vi) अंडाशय से अंडोत्सर्ग प्रारंभ होने लगता है।
(Vii) रजोधर्म प्रारंभ हो जाता है।
(Viii) त्वचा तैलीय हो जाती है। कभी-कभी मुहाँसे निकल आते हैं।
(ix) स्तनाग्र को त्वचा का रंग गहरा भूरा होने लगता है।
(x) ध्वनि सुरीली हो जाती है।
(xi) विपरित लिंग की ओर आकर्षण होने लगता है।
विज्ञान-X | 185
प्रश्न 4. माँ के शरीर में गर्भस्य भ्रूण को पोषण किस प्रकार प्राप्त होता है?
उत्तर- माँ के शरीर में गर्भस्थ धूण एक रस्सी जैसी संरचना के साथ प्लेसेंटा के माध्यम से जुड़ा होता है। प्लेसेंटा गर्भाशय की भित्ति पर विकसित होता है। माँ के शरीर से पोषक तत्त्व प्लेसेंटा के माध्यम से धूण में प्रवेश करते हैं। प्लेसेंटा एक तश्तरी की आकृति का ऊतक होता है जो गर्भाशय की भित्ति में धंसा होता है। प्लेसेंटा पूर्ण की ओर प्रवर्ध बनाता है तथा माँ के शरीर की ओर गुहा। ये प्रवर्ध माँ से चूर्ण को ग्लूकोज, ऑक्सीजन एवं अन्य पदार्थों को प्रदान करते हैं।
प्रश्न 5. यदि कोई महिला कॉपर-टी का प्रयोग कर रही है तो क्या यह उसकी यौन-संचरित रोगों से रक्षा करेगा? उत्तर- कॉपर-टी का प्रयोग एक गर्भनिरोधक उपाय है जो युग्मज को गर्भाशय से नहीं जुड़ने देता अर्थात् धूण का आरोपण नहीं होने देता। परन्तु यह किसी महिला को यौन संचरित रोगों से बचाने में सहायता नहीं कर सकती क्योंकि ये रोग लैंगिक अंगों के सम्पर्क में आने से फैलते हैं तथा कॉपर-टी मैथुन के समय लैंगिक अंगों को परस्पर संपर्क में आने से नहीं रोक सकती।
पाठ्यपुस्तक के अभ्यास के प्रश्न
(TEXTUAL EXERCISES)
प्रश्न 1. अलैंगिक जनन मुकुलन द्वारा होता है।
(a) अमीबा
(b) यीस्ट
(c) प्लैज्मोडियम
(d) लेस्मानिया
उत्तर-
(b) यीस्ट
प्रश्न 2. निम्न में से कौन मानव में मादा जनन तंत्र का भाग नहीं है?
(a) अंडाशय
(b) गर्भाशय
(c) शुक्रवाहिका
(d) डिंबवाहिनी
उत्तर- (c) शुक्रवाहिका
प्रश्न 3. परागकोश में होते हैं-
(a) बाह्यदल
(b) अंडाशय
(c) अंडप
(d) पराग कण
उत्तर (d) पराग कण
प्रश्न 4. अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के क्या लाभ हैं?
उत्तर- अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के निम्नलिखित लाभ हैं-
(1) लैंगिक जनन से उत्पन्न जीवों में विभिन्नताएँ आती हैं जो अलैंगिक जनन में संभव नहीं हैं।
(ii) विभिन्नताओं के कारण संतति में नये लक्षण उत्पन्न होते हैं।
(iii) इसके कारण स्पीशीज के उद्भव में सहायता मिलती है तथा यह विकास के लिए आवश्यक है। (iv) लैंगिक जनन से उत्पन्न अधिकतर जीव अपने आप को वातावरण में परिवर्तनों के प्रति अनुकूलित कर लेते हैं जिसके कारण उन्हें जीवित रहने का लाभ मिलता है।
प्रश्न 5. मानव में वृषण के क्या कार्य हैं?
उत्तर- मानव में वृषण के कार्य
(1) वृषण नर युग्मक उत्पन्न करते हैं जिन्हें शुक्राणु कहते हैं।
(ii) वृषण नर लैंगिक हार्मोन टेस्टोस्टेरोन को स्त्रावित करते हैं। यह हामीन लैगिक अंगों तथा द्वितीयक लैंगिक के विकास को नियंत्रित करता है।
प्रश्न 6. ऋतुस्त्राव क्यों होता है?(HBSE 2018)
उत्तर- निषेचित अंड को ग्रहण करने के लिए गर्भाशय स्वयं को तैयार करता है। गर्भाशय की भित्ति मोटो होतो चली जाती है. इसमें प्रचुर मात्रा में रक्त वाहिनियाँ होती हैं। परन्तु यदि निषेचन क्रिया नहीं होती है तो गर्भाशय की मोटी परत की आवश्यकता नहीं रहती, इसलिए यह परत धीरे-धीरे टूटकर योनि मार्ग से रूधिर एवं म्यूकस के रूप में निष्कासित होती है। भित्ति में उपस्थित रक्त वाहिकाएँ फट जाती है। इसलिए रक्तस्राव भी होता है जिसमें रक्त के साथ-साथ मृत अंडाणु भी बाहर आ जाता है, इसे ऋतुस्नाव कहते है। यह 2 से 8 दिन तक जारी रहता है। ऋतुस्राव प्रत्येक 28 दिन के अंतराल के पश्चात होता है।
प्रश्न 7. पुष्प की अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाइए।
उत्तर-
प्रश्न 8. गर्भनिरोधन की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं?
उत्तर- गर्भनिरोधन की विभिन्न विधियाँ निम्नलिखित हैं।
(1) रोधिका (भौतिक अवरोध) रोधिका विधियों में कंडोम, मध्यपट (diaphragm) और गर्भाशय ग्रीवा आच्छर (cervical caps) जैसी भौतिक युक्तियों का उपयोग होता है। ये मैथुन के दौरान मादा जननांग में शुक्राणुओं के प्रवेश को रोकती हैं। (i)
रासायनिक विधियाँ-महिलाओं द्वारा गर्भ नियंत्रण हेतु विशिष्ट औषधियों का उपयोग ही रासायनिक विधि है। ये दवाएँ दो प्रकार की होती हैं- (a) मुखीय गोलियाँ तथा (b) योनि गोलियाँ। मुखीय गोलियाँ मुख्यतः हार्मोनों से बनी होती हैं तथा इन्हें मुखीय गर्भनिरोधक कहते हैं। योनि गोलियाँ शुक्राणुओं को मार देती है तथा मुखीय गोलियाँ अडोत्सर्जन को रोकती है। अतः गर्भाशयी गर्भनिरोधक युक्तियों का उपयोग भी बहुत
प्रभावशाली और लोकप्रिय है। (iii) अंतरागर्भाशय गर्भनिरोधक यंत्र-इस विधि में एक व्यवहारकुशल चिकित्सक अथवा अनुभवी परिचारिका द्वारा गर्भाशय के अंदर ताँबे की टी (Cu-T) डाली जाती है। यह युक्ति गर्भाशय में रोपण प्रक्रिया को बाधित करती है।
चित्र-अंतः गर्भाशय गर्भनिरोधक युक्तियाँ
(iv) शल्यक्रिया विधियों-
मूत्रवाहिनी
- मूत्राशय
शुक्राराय
फैलोपियन नलिका
गर्भाशय
फैलोपियन नलिका का कटा भाग
प्रोस्टेट
शुक्रवाहिनी का
कटा भाग शुक्रवाहिनी
चित्रः पुरुष में वासेक्टोमी (नसबंदी)
चित्रः स्त्री में ट्यूवेक्टोमी (नसबंदी)
(HBSE 2023)
अंडाशय से निक
इस विधि में पुरुष की शुक्रवाहक नली तथा स्त्री की डिम्बवाहिनी नली के छोटे-से भाग को शल्यक्रिया द्वारा काटकर बांध दिया जाता है। इसे नर में पुरुष नसबंदी (वासेक्टोमी) तथा स्त्री में स्त्री नसबंदी (ट्यूबेक्टोमी) कहते हैं।
प्रश्न 9. एक-कोशिक एवं बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में क्या अंतर है? उत्तर- एक-कोशिक एवं बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में अंतर
क्र.सं.
एक-कोशिक जीव में जनन पद्धति
(i)
एक-कोशिक जीवों में सामान्यतः अलैंगिक जनन होता है।
(ii)
इस प्रक्रम में एक जीव की आवश्यकता होती है।
(iii)
जनन के लिए विशिष्ट कोशिकाएँ नहीं होती।
(iv)
जनन के लिए विशेष अंग नहीं होते।
बहुकोशिक जीव में जनन पद्धति
न बहुकोशिक जीवों में सामान्यतः लैंगिक जनन होता है।
इस प्रक्रम में नर और मादा दोनों की आवश्यकता होती है।
जनन के लिए विशिष्ट कोशिकाएं होती है।
जनन के लिए विशेष अंगों की आवश्यकता होती है जो शरीर में निश्चित स्थान पर होते हैं।
प्रश्न 10. जनन किसी स्पीशीज की समष्टि के स्थायित्व में किस प्रकार सहायक है? उत्तर- जनन के कारण उत्पन्न विभिन्नताएँ किसी स्पीशीज की समष्टि को स्थायित्व प्रदान करती हैं क्योंकि इन विभिन्नताओं के कारण जीव अपने आपको पर्यावरण की बदलती परिस्थितियों में भी अनुकूलित कर लेते हैं। इस अनुकूलनता के कारण प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्पीशीज के जीव जीवित रहते हैं तथा स्पीशीज समाप्त नहीं होती।
प्रश्न 11. गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के क्या कारण हो सकते है?
उत्तर- गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
(1) जन्म दर को नियंत्रित करना एवं जनसंख्या वृद्धि को रोकना।
(ii) जल्दी-जल्दी गर्भधारण से माँ के शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम करना।
(iii) यौन-संचरित रोगों से सुरक्षा प्रदान करना।

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