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प्राणियों में पोषण, class 7th, lesson 2




कक्षा :7  ,        विज्ञान   
अध्याय  : 2 ,  प्राणियों में पोषण
पाठ्य पुस्तक में संपूर्ण अध्याय के बेहतरीन नोट्स व अभ्यास के प्रश्न उत्तर

अध्याय के महत्वपूर्ण बिंदु

पोषण
प्राणियों द्वारा पोषक तत्वों की आवश्यकता, भोजन ग्रहण करने की विधि और शरीर में इसके उपयोग की विधि को पोषण कहते हैं।
पाचन
जटिल खाद्य पदार्थों का सरल पदार्थों में परिवर्तित होना या टूटना पाचन कहलाता है।

विभिन्न जीवो में खाद्य अंतग्रहण की विभिन्न विधियां
विभिन्न जीव भिन्न भिन्न विधि द्वारा भोजन अंतर ग्रहण करते हैं
मधुमक्खी , मर्मर पक्षी (हमिंग बर्ड ) -- मकरंद --चूसकर।
मानव अन्य जंतुओं के शिशु   -- मां का दूध --पीकर।
सांप ,अजगर ------निगलकर
घौंघा   ---फूल ,पत्ते ----काटकर।
चींटी --- काटकर
चील     ------- पकड़ कर निगलना
मच्छर   ------ चूषण
घरेलू मक्खी ---   स्पंजी
स्टार फिश -----कैल्शियम कार्बोनेट के कठोर कवच वाले जंतुओं का आहार करती है---- अमाश्य के द्वारा

मानव आहार नाल में कौन-कौन से भाग हैं
मानव आहार नाल  निम्न भागों से मिलकर बनती है । मुखगुहिका ,ग्रासनली या ग्रसिका, अमाशय, क्षुद्र आंत्र (छोटी आंत), बृहदांत्र (बड़ी आंत), मलद्वार (गुदा) ।
पाचक रस
लाला ग्रंथि, यकृत, अग्नाशय अनेक रस स्त्रावित करते हैं। इन्हें पाचक रस कहते हैं। यह जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में बदल देते हैं।
पाचन तंत्र
आहार नाल तथा संबंधित ग्रंथियां मिलकर पाचन तंत्र का निर्माण करते हैं। जैसा चित्र में दर्शाया गया।
अंत ग्रहण
आहार को शरीर के अंदर लेने की प्रक्रिया को अंतर ग्रहण कहते हैं। हम भोजन का अंत ग्रहण मुख द्वारा करते हैं।
दांतो के प्रकार एवं कार्य
मानव दांत चार प्रकार के होते हैं:-
कृंतक
इन दांतों की संख्या 8 होती है। यह काटने के कार्य करते हैं।
रदनक
 इन दांतों की संख्या 4 होती है। यह चीरने, फाड़ने के काम आते हैं।
अग्र चवर्णक
 इन दांतों संख्या 8 होती है ।यह चबाने का कार्य करते हैं।
चवर्णक
इन दांतों की संख्या 12 होती है । यह पीसने का कार्य करते हैं।
दांतो का कार्य भोजन को चबाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलना होता है।
मुख में उपस्थित लाला ग्रंथि लाला रस निकालती है और भोजन को मुलायम बना देती है तथा मंड को शर्करा में बदल देती है। मुख में मंड का पाचन हो जाता है।
मनुष्य में 8 वर्ष की आयु तक दूध के दांत होते हैं। दूध के दांत गिरने के बाद स्थाई दांत आते हैं।
जीभ पर स्वाद के विभिन्न क्षेत्र
 जीव एक मांसल पर्शिया अंग है । यह भोजन में लार मिलाने का कार्य तथा निगलने में सहायता करती है। जीभ में स्वाद कालिकाएं होती है। जिनसे हम विभिन्न प्रकार के स्वाद का पता लगाते हैं। जैसा चित्र में दर्शाया गया है।
भोजन नली या ग्रसिका
मुख में भोजन चबाने के बाद भोजन भोजननली में जाता है। ग्रसिका की भिति व संपूर्ण आहार नाल के संकुचन से भोजन नीचे की ओर सरकता जाता है।  भोजन ग्रसिका से अमाश्य में चला जाता है। यदि अमावस्या भोजन स्वीकार ना करें तो हमें वामन या उल्टी आ जाती है। जैसा चित्र में दर्शाया गया।
अमाशय
ग्रसिका के बाद भोजन अमाशय में जाता है। यह मोटी भित्ति  वाली एक थाली नुमा संरचना है। यह चपटा तथा J आकृति का है। यह आहार नाल का सबसे चौड़ा भाग है। अमाशय में शैलेष्मल ,हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस स्रावित होते है। शैलेष्मल अमाशय के आंतरिक अस्तर को सुरक्षा प्रदान करता है। अम्ल जीवाणुओं को नष्ट करता है। भोजन को पचाने में सहायता करता है।
अमाशय में प्रोटीन का आंशिक पाचन होता है।
यकृत 
यकृत गहरे लाल भूरे रंग की ग्रंथि है, जो उदर के ऊपरी भाग के दक्षिण और अवस्थित होती है । यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह पितरस स्रावित करती है। जो एक थैली में संग्रहित होता रहता है। जिसे पित्ताशय कहते हैं। पितरस वसा के पाचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अग्नाशय
 यह हल्के पीले रंग की बड़ी ग्रंथि है। जो अमाशय के ठीक नीचे स्थित होती है। अग्नाशय रस कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन पर क्रिया करता है तथा इनको उनके सरल रूप में परिवर्तित कर देती है। आंशिक रूप से पचा भोजन क्षुद्रआंत्र के निचले भाग में पहुंचता है, जहां आंत्र रस पाचन क्रिया को पूर्ण कर देता है। यहां कार्बोहाइड्रेट- ग्लूकोज मे , वसा- वसा अम्ल एवं ग्लिसरोल में तथा प्रोटीन- अमीनो अम्ल में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार छोटी आंत में भोजन का पूर्ण पाचन हो जाता है।
अवशोषण
पचा हुआ भोजन अवशोषित होकर छोटी आंत की भिति में स्थित रुधिर वाहिकाओं में चला जाता है। इसे अवशोषण कहते हैं
दीर्घरोम या रस अंकुर
छोटी आंत की आंतरिक भित्ति पर उंगली के समान उभरी हुई संरचनाएं होती है। जिन्हें दिर्घरोम या रसअंकुर कहते हैं। 
दीर्घ रोम का कार्य
दीर्घ रोम पचे हुए भोजन के अवशोषण हेतु तल का क्षेत्र बढ़ा देते हैं। प्रत्येक दीर्घ रोम में सुक्ष्म रुधिर वाहिकाओं का जाल फैला रहता है। दीर्घ रोम की स्तह से पचे हुए भोजन का अवशोषण होता है तथा यह रुधिर वाहिकाओं में चला जाता है। रुधिर वाहिका से यह शरीर के सभी भागों तक पहुंच जाता है।
स्वांगीकरण
जिस प्रक्रम से दीर्घरोम द्वारा अवशोषित सरल पदार्थों के उपयोग हेतु इन्हे जटिल पदार्थों में परिवर्तित किए जाते हैं, उसे स्वांगीकरण कहते हैं।
क्षुद्रांत या छोटी आंत
यह लगभग 7.5 मीटर लंबी होती है। यह यकृत एवं अग्नाशय से स्त्राव प्राप्त करती है । कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा का संपूर्ण पाचन यहीं होता है। यह मानव पाचन तंत्र का सबसे लंबा भाग है।
बृहदांत्र
यह छोटी आंत की अपेक्षा चौड़ी एवं छोटी होती है। यह लगभग 1.5 मीटर लंबी होती है। इसका मुख्य कार्य जल एवं लवणों का अवशोषण करना तथा अपशिष्ट पदार्थ को मलाशय में भेजना है। 
निष्कासन
जब मलाशय अपशिष्ट पदार्थ से भर जाते हैं। तो गुदा द्वारा यह मल शरीर से बाहर निकाला जाता है। इस प्रक्रिया को निष्कासन कहते हैं।
रूमिनेंट या रोमन्थी जंतु
गाय,भैंस आदि घास खाने वाले जंतु जो घास खाने के बाद घास को पचाने के लिए जुगाली करते हैं, उन्हें रूमिनेंट कहते हैं।
ऐसे जंतु पहले घास को जल्दी जल्दी निकल कर अमाश्य के एक भाग में भंडारित कर लेते हैं। यह भाग रूमैन कहलाता है। रूमिनेंट में अमाश्य चार भागों में बंटा होता है। रूमैन में भोजन का आंशिक पाचन होता है। परंतु बाद में जंतु इसको छोटे-छोटे पिंडको के रूप में पुनः मुख मे ला कर चबाते हैं। इस प्रक्रिया को रोमथन या जुगाली कहते हैं।
घास को मनुष्य क्यों नहीं पचा सकता
क्योंकि घास में सैलूलोज नामक कार्बोहाइड्रेट होता है। इसको पचाने के लिए रूमिनेंट (घोड़ा ,खरगोश, गाय, भैंस) आदि में छोटी आंत तथा बड़ी आंत के बीच एक थैली नुमा बड़ी संरचना होती है। जिसे अंधनाल कहते हैं। इसमें सैलूलोज को पचाने वाले जीवाणु पाए जाते हैं। जो सेलुलोज का पाचन कर देते हैं। परंतु मनुष्य में यह जीवाणु नहीं पाए जाते इसलिए मनुष्य सेलुलोज का पाचन नहीं कर पाता।
अमीबा में पाचन
अमीबा जलाशय में पाए जाने वाला एक कौशिक जीव है । अमीबा की कोशिका में एक कोशिका झिल्ली होती है। एक गोल संघन केंद्र एवं कोशिका द्रव में बुलबुले के समान अनेक धानियां होती हैं । अमीबा निरंतर अपनी आकृति एवं स्थिति बदलता रहता है। यह एक अथवा अधिक उंगली के समान प्रवर्ध निकालता रहता है। जिन्हें पादाभ कहते हैं ।जो इन्हें गति देने और भोजन पकड़ने में सहायता करता है।
 अमीबा सूक्ष्म जीवों का आहार करता है। जब इसे भोजन का आभास होता है। तो यह खाद्य कणों के चारों ओर पादाभ विकसित करके उसे निगल लेता है। खाद्य पदार्थ उसकी खादधानि में फंस जाते है
 खानधानी में ही पाचक रस स्रावित होते हैं। यह खाद्य पदार्थ पर क्रिया करके उसे सरल पदार्थों में बदल लेते हैं। और पचा हुआ खाद्य धीरे-धीरे अवशोषित हो जाता है। बिना पचा अपशिष्ट खाद धानी द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

         अभ्यास के प्रश्न उत्तर
प्रश्न 1 उचित शब्द द्वारा रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।
उत्तर
मानव पोषण के मुख्य चरण अंतग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण एवं निष्कासन हैं।
मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि का नाम यकृत है।
अमावस्या में हाइड्रोक्लोरिक अमल एवं पाचक रस का स्राव होता है । जो भोजन प्रक्रिया करते हैं।
घ क्षुद्रआंत्र की आंतरिक भीती पर उंगली के समान अनेक संरचनाएं होते हैं। जो दीर्घ रोम कहलाते हैं।
अमीबा अपने भोजन का पाचन खादधानी में करता है।

प्रश्न 2 सत्य एवं असत्य कथनों को चिन्हित कीजिए।
उत्तर
मंड का पाचन अमाशय से प्रारंभ होता है। असत्य
जीभ लाला ग्रंथि को भोजन के साथ मिलाने में सहायता करती है। सत्य
पित्ताशय में पित्त रस अस्थाई रूप से भंडारी होता है। सत्य
घ  रूमिनेंट निकली हुई घास को अपने मुख में वापस लाकर धीरे-धीरे चबाते रहते हैं। सत्य
प्रश्न 3 निम्न में से सही विकल्प पर सही का निशान लगाइए।
उत्तर
वसा का पूर्णरूपेण पाचन किस अंग में होता है।
उत्तर  छोटी आत
जल का अवशोषण मुख्यतः किस अंग द्वारा होता है 
उत्तर  बड़ी आंत
प्रश्न 4  कॉलम ए में दिए गए कथनों को कालम बी में दिए गए कथनो से मिलान कीजिए।
उत्तर
 कॉलम ए           कोलम बी
कार्बोहाइड्रेट       शर्करा
वसा                  वसा अम्ल एवं ग्लिसरोल
प्रोटीन               अमीनो अमल
प्रश्न 5 दीर्घ रोम क्या है। वह कहां पाई जाती हैं। एवं उनके कार्य क्या हैं?
उत्तर
छोटी आंत की आंतरिक भित्ति पर उंगली के समान उभरी हुई संरचनाएं होती है। जिन्हें दिर्घरोम या रसअंकुर कहते हैं। 
दीर्घ रोम का कार्य
दीर्घ रोम पचे हुए भोजन के अवशोषण हेतु तल का क्षेत्र बढ़ा देते हैं। प्रत्येक दीर्घ रोम में सुक्ष्म रुधिर वाहिकाओं का जाल फैला रहता है। दीर्घ रोम की स्तह से पचे हुए भोजन का अवशोषण होता है तथा यह रुधिर वाहिकाओं में चला जाता है। रुधिर वाहिका से यह शरीर के सभी भागों तक पहुंच जाता है।
प्रश्न 6 पित्त कहां निर्मित होता है । यह भोजन के किस घटक के पाचन में सहायता करता है?
उत्तर
पित्त रस यकृत में निर्मित होता है तथा पित्ताशय में संग्रहित होता रहता है। यह भोजन में वसा के पाचन में सहायता करता है।

प्रश्न 7 उस कार्बोहाइड्रेट का नाम लिखिए जिसका पाचन रूमिनेंट द्वारा किया जाता है ,परंतु मानव द्वारा नहीं। इसका कारण बताइए।
उत्तर 
घास में सैलूलोज नामक कार्बोहाइड्रेट होता है। इसको पचाने के लिए रूमिनेंट (घोड़ा ,खरगोश, गाय, भैंस) आदि में छोटी आंत तथा बड़ी आंत के बीच एक थैली नुमा बड़ी संरचना होती है। जिसे अंधनाल कहते हैं। इसमें सैलूलोज को पचाने वाले जीवाणु पाए जाते हैं। जो सेलुलोज का पाचन कर देते हैं। परंतु मनुष्य में यह जीवाणु नहीं पाए जाते इसलिए मनुष्य सेलुलोज का पाचन नहीं कर पाता।
प्रश्न 8 क्या कारण है कि हमें ग्लूकोस से ऊर्जा तुरंत प्राप्त होती है।
उत्तर क्योंकि ग्लूकोज भोजन का सबसे सरल एवं पचा हुआ भाग होता है। जिसे अवशोषित करना सरल होता है। इसलिए ग्लूकोस से हमें तुरंत ऊर्जा प्राप्त होती है।
 प्रश्न 9  आहार नाल के कौन से भाग द्वारा संपादित होती हैं।
1 पचे भोजन का अवशोषण-- छोटी आंत
2 भोजन को चबाना-- मुख
3 जीवाणु नष्ट करना-- हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
4 भोजन का संपूर्ण पाचन-- छोटी आंत
5 माल का निर्माण-- बड़ी आंत या मलाशय
प्रश्न 10 मानव एवं अमीबा के पोषण में कोई एक समानता एवं एक अंतर लिखिए।
उत्तर
 समानता
मानव तथा अमीबा दोनों भोजन से पोषक तत्व का अवशोषण तथा अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन करते हैं।
अंतर
मानव भोजन का अंतग्रहण मुख द्वारा करता है, लेकिन अमीबा खाद धानी द्वारा करता है।
प्रश्न 11 कॉलम ए में दिए गए शब्दों का मिलान  कॉलम भी के उचित कथन से कीजिए।
उत्तर 
  कॉलम ए       ---        कॉलम बी
क  लाला ग्रंथि      --- लाला रस स्रावण करना
ख  अमाशय--------अमल का निर्मोचन
ग   यकृत ------पित्त रस का स्राव
घ   मलाशय-----बिना पचे भोजन का भंडारण 
                        ---    मल त्याग
च  क्षुद्रांत्र------पाचन का पूरा होना
छ  बृहदांत्र------जल का अवशोषण 
प्रश्न 12 दिए हुए पाचन तंत्र के आरेख को नामांकित कीजिए।
उत्तर





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